मेरी एक बुराई है,
जल्दी मै किसी को अपना नही बना पता ,
और जो हैं या बना ली
उसे औपचारिक नही हो पाती
जबकि आज अपने भी औपचारिकता खोजते हैं
फ़ोन करके आना फोन करके जाना
बिन मांगे अपनी राय नहीं रखना ,
घर के मिश्री शक्कर को छोड़,
मलाई छेना खिलाना
कितना अजीब है ना सब ,
ये अपनो के बीच में
जहां बातें सोच समझ के बोलना पड़े
वहां कैसा अपनापन,
इससे बेहतर है चुप रहना
हमसे नही हो पाएगा ये,
झूट का दिखावा,
नहीं छोड़ेंगे तुमको,
चलो अब तुमसे भी
औपचारिक होके बात करते हैं ।